where the Pakisthan Hindus for ever ?


कहाँ गए पाकिस्तान के अल्पसंख्यक
वुसतुल्लाह ख़ान | बुधवार, 15 अगस्त 2012, 13:54 IST
पाकिस्तान बनने के बाद जब पहली बार जनगणना की गई थी तो उस समय पाकिस्तान की तीन करोड़ चालीस लाख आबादी में से पांच प्रतिशत गैर-मुसलमान थे.

मगर आज पाकिस्तान के 18 करोड़ नागरिकों में गैर-मुसलमानों की सूची में अहमदी समुदाय को शामिल कर लिए जाने के बावजूद वहां गैर-मुसलमानों की संख्या पांच प्रतिशत से घट कर लगभग साढ़े तीन प्रतिशत रह गई है.

आखिर ऐसा कैसे और क्यों हुआ? कहा जाता है 1947 में कराची और पेशावर में लगभग डेढ़ हजार यहूदी बसा करते थे. ये पाकिस्तानी यहूदी अगले पांच सालों में वापस इसराइल चले गए.

विभाजन के समय कराची और लाहौर में दस हजार से अधिक पारसी मौजूद थे जबकि आज लाहौर में पैंतालीस पारसी भी नहीं बचे हैं. कराची में अगर कुछ पारसी बचे हुए हैं भी तो उनकी उम्र साठ साल से ऊपर की है.

पारसी समुदाय की नई पीढ़ी यहां पल-पल बदल रही स्थानीय परिस्थितियों के कारण देश छोड़कर यूरोप और अमरीका जा चुकी है.

19वीं सदी में गोवा से कराची में आकर रहने वाले रोमन कैथोलिक गोआनीज की आबादी विभाजन के समय 20 हजार से अधिक थी.

ये लोग शिक्षा, दफ्तरी काम-काज, संगीत और खाना पकाने के विशेषज्ञ थे.

हर दिन शाम को गोआ से आई सैकड़ों महिलाएं और पुरुष राष्ट्रपति क्षेत्र में शांति से टहला करते थे. लेकिन 65 सालों में कराची में रहने वाली इस आबादी की संख्या 20 से 40 हज़ार होने के बजाय 10 हजार हो गई.

और इन 10 हजार लोगों की आबादी भी कराची में इस वक़्त है ये कोई नहीं जानता.

हालांकि पाकिस्तान में डिजिटल रूप से हिंदू देश के सबसे बड़े ग़ैर मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, लेकिन हिंदूओं की तुलना में सिखों को पाकिस्तान के मुसलमान समाज ने ज्यादा गर्मजोशी से अपनाया है.

एक सिख नागरिक के साथ पाकिस्तान का एक आम स्थानीय मुसलमान का व्यवहार रुचिकर और उत्सुकता पैदा करने वाला होता है.

हालांकि दो साल पहले ख़ैबर इलाके में तालेबान द्वारा चार स्थानीय सिखों के अपहरण और उनमें से दो के सिर कलम किए जाने की घटना के बाद लगभग 20 हज़ार पाकिस्तानी सिखों में सरगर्मी फैल गई थी.

लेकिन पाकिस्तानी सिखों की संपत्ति पर बहुसंख्यक आबादी द्वारा यदा-कदा कब्ज़ा करने की घटनाओं के अलावा यहाँ आमतौर पर कोई और शिकायत नहीं लगती.

पाकिस्तान में सिखों की ज़्यादातर आबादी खै़बर पख्तूनख्वाह़ प्रांत और ननकाना साहिब में रहती है.

अधिकांश सिखों का परिवार यहां खेतीबाड़ी और व्यापार के काम में मगन है. इनमें से कुछ तो मीडिया के पोस्टर बॉयज भी हैं.

यहां जब भी किसी चैनल पर धार्मिक सहिष्णुता पर वीडियो रिपोर्ट बनाई जाती है तो निर्माता की पूरी कोशिश होती है कि इस वीडियो में पंजाब विधानसभा के सदस्य कल्याण सिंह कल्याण या लाहौर यातायात पुलिस के पहले सिख वार्डन गुलाब सिंह का कोई फुटेज दिखाया जाए.

इसके अलावला पंजाबी पॉप गायिका जस्सी-लाइल-पुरी की संगीत एलबम का भी कोई क्लिप डालने की पूरी कोशिश होती है.

पाकिस्तान में जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से हिंदूओं की संख्या लगभग 30 लाख और पाकिस्तान हिंदू परिषद के अनुसार 70 लाख है.

बहरहाल संख्या जो भी हो पाकिस्तान में रह रहे 94 प्रतिशत हिंदू सिंध में बसते हैं.

विभाजन के बाद से अब तक पाकिस्तानी हिंदू समुदाय कम से कम चार-बार ये सोचने पर मजबूर हुआ कि वे पाकिस्तान में रहना चाहते हैं या नहीं.

1965 की लड़ाई के दौरान कम से कम 10 हजार के लगभग हिंदूओं की आबादी अपनी संपत्ति छोड़कर भारत चली गई थी.

1971 के युद्ध के दौरान और बाद लगभग नब्बे हजार हिंदू राजस्थान के शिविरों में चले गए. ये लोग थरपारकर इलाके थे जिस पर भारतीय फौज का कब्जा हो गया था.1978 तक उन्हें शिविरों से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी.

इनमें से बहुत से पाकिस्तान लौटना चाहते थे. बाद में भुट्टो सरकार ने इलाका वापस ले लिया लेकिन सरकार ने लोगों को वापस लेने में कोई रुचि नहीं दिखाई.

फिर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद पाकिस्तान में जो प्रतिक्रिया हुई उसके परिणाम में अगले पांच साल के दौरान लगभग सत्रह हजार पाकिस्तानी हिंदू भारत चले गए.

इस बार अधिकांश पलायन करने वालों का संबंध पंजाब से था. 1965 और 1971 में पाकिस्तान से जाने वाले हिंदूओं को आख़िरकार दो हजार चार में भारतीय नागरिकता मिल गई लेकिन बाबरी मस्जिद की प्रतिक्रिया के बाद जाने वाले पाकिस्तानी हिंदूओं को अब तक नागरिकता नहीं मिल सकी है.

आज भी लगभग एक हज़ार हिंदू परिवार पाकिस्तानी पासपोर्ट पर रह रहे हैं और नागरिकता की मांग कर रहे हैं.

अब एक बार फिर उत्तरी सिंध में अपहरण की बढ़ती घटनाओं, संपत्तियों पर कब्जे, धार्मिक चरमपंथ और हिंदू लड़कियों के इस्लाम अपनाने ने हिंदू समुदाय को भयभीत कर दिया है.

जहां तक ​​हिंदूओं के बाद पाकिस्तान की दूसरी बड़ी अल्पसंख्यक यानी ईसाइयों का मामला है तो सरकारी अनुमान के अनुसार लगभग पौने दो प्रतिशत पाकिस्तानी नागरिक ईसाई हैं.

पाकिस्तान क्रिसचियन कांग्रेस नामक संगठन के प्रमुख नज़ीर भट्टी ने तीन दिन पहले लगभग ढाई सौ हिंदूओं की भारत प्रस्थान पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि वह तो भारत जा सकते हैं. हम कहां जाएंगे.

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