Fear of truth


जवाब: किसका मान-मर्दन

अपनी यह नकारात्मक ताकत वामपंथी भी जानते हैं।

शंकर शरण
जनसत्ता 4 अगस्त, 2013: वीरेंद्र यादव की टिप्पणी ‘‘निराला का ‘हिंदू सांप्रदायिक’ होना’’ (21 जुलाई) [ वीरेंद्र यादव का उक्त लेख इस लेख के अंत में दिया गया है ] में मनोरंजक अंतर्विरोध है।

पहले स्वीकार कर कि निराला मार्क्सवादी-प्रगतिवादी नहीं थे, फिर बाकी लेख में उन्हें कम्युनिस्ट समर्थक बताया है! फिर यह भी व्यंग्यात्मक है कि लांछन से लेख आरंभ करते हुए किसी के मान-मर्दन की चिंता की जाए! 14 जुलाई को छपे मेरे लेख ‘क्या निराला प्रगतिवादी थे?’ में निराला का सम्मान है या अपमान, यह पाठक खुद तय कर सकते हैं।

पर तथ्यों में कुल मिला कर उस लेख की एक ही बात को ‘झूठ’ और ‘आपत्तिजनक’ कहा गया कि ‘निराला प्रगतिवादियों को पसंद नहीं करते थे’। साथ ही ऐसा ‘झूठ’ प्रसारित करने में संपादक पर दुर्भावना का आरोप भी उसी कलम ने अन्यत्र लगाया है।
उत्तर में एक मार्क्सवादी को ही लें। कर्णसिंह चौहान की पुस्तक प्रगतिवादी आंदोलन का इतिहास (1998) के पृष्ठ 76-77 पर लिखा है कि ‘‘प्रगतिशीलों को देख कर निराला के मन में यह धारणा बनी कि प्रगतिशील लेखकों में अधिकांश वे हैं जो बड़े घरानों के हैं, ऊंची डिग्रियां और समाजवादी विचारधारा का एक बौद्धिक आवरण यूरोप से लेकर आए हैं तथा मुक्त घूमती हुई नव-शिक्षित आधुनिकाएं हैं।’’ और निराला की नजर में ‘‘ये प्रोग्रेसिव राइटर्स लेखक से ज्यादा नेता थे, विशेष रूप से हिंदी साहित्य से अपरिचित, लेकिन दूसरों को रास्ता बताने को उत्सुक।’’ सच पूछें तो इन शब्दों में प्रगतिवादियों के प्रति निराला की नापसंदगी से भी अधिक लिखा हुआ है।
फिर भी अगर निराला को प्रगतिवादी/ कम्युनिस्ट ठहराने की जिद हो, तो कम्युनिस्ट-प्रगतिवाद के जन्म से लेकर निराला के निधन तक के पच्चीस-तीस वर्षों में निराला के लेखन और कार्य से कुछ नहीं दिखाया जाता। दूसरों की टीका-टिप्पणियों से निराला को प्रगतिवादी बताने की कोई तुक नहीं। स्वयं निराला की इक्का-दुक्का पंक्ति, वह भी किसी को भेजा शुभकामना संदेश, जैसी चीजें तो अपवाद ही ठहरती हैं। फिर मुहावरे में अपने ‘कम्युनिस्ट’ होने जैसी बात तो गांधीजी ने भी कही थी। तो क्या गांधी को कोई कम्युनिस्ट-प्रगतिवादी मान ले!
फिर कम्युनिस्ट हमेशा राजनीतिक अभियान चलाने, किसी चीज या व्यक्ति के पीछे पड़ने वाले रहे हैं। तो किस अभियान में निराला उनके साथ थे? क्या 1942 में रूस को अपनी ‘पितृभूमि’ बताने में निराला उनके साथ थे; या 1940-47 के बीच ‘मुसलिमों के आत्मनिर्णय का अधिकार’ का सिद्धांत देकर उत्साहपूर्वक भारत विभाजन कराने (ख्वाजा अहमद अब्बास के शब्दों में ‘भारत की हत्या करने’) में; 1948 में सशस्त्र विद्रोह कर भारतीय सत्ता पर कब्जा करने में या 1956 में ख्रुश्चेव रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद विगत दशकों की भयंकर कम्युनिस्ट करतूतों की लीपापोती करने में? कम्युनिस्टों के किस आह्वान का निराला ने समर्थन किया, यह बताए बिना सारी बात, निराला के ही शब्द का उपयोग करें तो, ‘प्रोपेगंडा’ है। वह एकमात्र कार्य, जिसके कम्युनिस्ट माहिर हैं।
उस जमाने की एक और बात ध्यान रखनी चाहिए। तब रूसी ‘लौह दीवार’ वाली छिपावट और विश्वव्यापी मनोहर प्रचार के कारण लोग उन लोमहर्षक सचाइयों को जानते भी नहीं थे, जो ख्रुश्चेव रिपोर्ट खुलने के बाद मालूम हुई। इसलिए बहुतेरे लेखक, कवि अनजाने ही कम्युनिस्टों के प्रति मुगालते में रहे थे। यह अकारण नहीं कि 1956 के बाद दुनिया भर में लाखों लोगों, बुद्धिजीवियों ने कम्युनिज्म से तौबा कर ली। उस मार्मिक युग को समझने के लिए प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक हावर्ड फास्ट की ‘द नेकेड गॉड: राइटर ऐंड द कम्युनिस्ट पार्टी’ एक क्लासिक दस्तावेज है।
इन सबके बावजूद, खोज-खाज कर एकाध पंक्ति जुटाने का अर्थ यही है कि निराला कभी कम्युनिस्ट-प्रगतिवादी नहीं रहे। उलटे साहित्य और सामाजिक समस्याओं पर उनका विश्लेषण नितांत विपरीत था। वर्ग-संघर्ष या रूसी उदाहरणों को निराला भारत के लिए अप्रासंगिक मानते थे। इसीलिए प्रगतिवादी सभा-सम्मेलनों में निराला के किसी वक्तव्य या संदेश तक का जिक्र नहीं आता (जैसा प्रेमचंद की एक सहभागिता का बार-बार किया जाता है)। न प्रगतिशील लेखक संघ के प्रस्तावों, दस्तावेजों में निराला या उनकी किसी रचना का अभिनंदन किया गया। निराला ने भी प्रगतिवादी लेखक की रचनाओं को इस लायक नहीं समझा कि उस पर कोई प्रशंसात्मक टिप्पणी करते।
निराला ने उस समय के कई कवियों, लेखकों पर पूरे लेख लिखे हैं। उदाहरण के लिए, गुरुभक्त सिंह ‘भक्त’ या रामेश्वरी देवी ‘चकोरी’। इन नामों से आज के अधिकतर पाठक परिचित तक न होंगे। तो कहां है किसी प्रगतिशील लेखक या आलोचक पर भी निराला का कोई लेख? लेख छोड़िए, कोई टिप्पणी भी? उलटे निराला ने अज्ञेय को हिंदी का ‘सबसे अग्रणी कवि’ (फोरमोस्ट पोएट) कहा था। उसी अज्ञेय को प्रगतिवादी क्या कहते रहे, वह लिखने लायक भी नहीं। हाल में, अज्ञेय जन्म-शती के अवसर पर भी उन्हें ऊल-जुलूल कहा गया। इससे प्रगतिवादियों की मूल, राजनीतिक फितरत का पता चलता है।
हिंदी का शायद ही कोई महत्त्वपूर्ण कवि, लेखक बचा होगा, जिसे वामपंथियों, विशेषकर मार्क्सवादियों ने गालियों से न नवाजा हो। बड़े प्रगतिवादी शिवदान सिंह चौहान ने ही 1946 में लिखा था कि तब प्रगतिशील लेखक संघ में कम्युनिस्ट पार्टी अनुयायियों और संगठन मंत्री के कुछ दोस्तों को छोड़ कर सारे लेखकों को ‘‘जनता के दुश्मन’’ कह कर, ‘‘राहुल, पंत, अज्ञेय, दिनकर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, यशपाल, नरेंद्र शर्मा, अश्क, बच्चन, बेनीपुरी, शिवदान आदि के नाम गिन-गिन कर जनद्रोही मुजरिमों के गले में तख्तियां लटकाई’’ गर्इं। अब अगर खुद प्रगतिवादियों की यह दुर्गति थी, तो उनके द्वारा निराला को दी गई सनद का क्या मूल्य लगाएं? फिर, जब खुद प्रगतिवादी नेता प्रगतिवादियों को इतना नापसंद करते थे, तो निराला की नापसंदगी पर आपत्ति क्या! दरअसल, प्रगतिवादियों को साहित्य या दर्शन से कोई विशेष लेना-देना नहीं। वे राजनीति और आक्षेप-प्रेमी हैं। ऐसे लाइलाज जीवों को कौन सच्चा साहित्यसेवी पसंद कर सकता है?
एक और बड़े प्रगतिशील लेखक, अमृत राय, का भी आकलन देखें, ‘‘साथी लेखकों को डांटने-फटकारने, डराने-धमकाने और अनुशासन का डंडा दिखाने का रूप ले लिया।… वातावरण में भयानक घुटन पैदा हो गई और आजादी से सांस लेना मुश्किल हो गया। और इन्हीं दूसरी ओछी बातों के कारण वातावरण इतना विषाक्त हो गया कि (लेखक) लोग डरे-सहमे मुंह पर ताला जड़े घूमते थे कि कहीं धोखे से मुंह से कोई ऐसी बात न निकल जाए कि मैं कायर और सुधारवादी या क्रांति का दुश्मन न करार दिया जाऊं।… बहुतों ने तो उस दौरान में अपनी कलम तोड़ कर फेंक दी। लिखना बिल्कुल बंद कर दिया। जिन्होंने ऐसा नहीं किया उन्होंने सबसे चुरा कर लिखना जारी रखा।’’ क्या ऐसे लेखकों के साथ निराला जैसे मुक्त, महाप्राण का दूर से भी मेल बैठता?
सच यही है कि निराला और प्रगतिवादियों का वास्तव में कभी, कोई साथ नहीं था। निराला की किसी बात को खींच-खांच कर उपयोग में लाने की बुद्धि बहुत बाद की है, जैसा कि प्रगतिवादियों ने विवेकानंद, रवींद्रनाथ ठाकुर और गांधी के लिए भी किया है। यह उनकी सद्बुद्धि से अधिक राजनीति-प्रियता है, जिसमें समय बदलने पर वे रंग बदला करते हैं।
कम्युनिस्ट-प्रगतिशील लेखन की समस्या यह है कि उसकी संपूर्ण, सिलसिलेवार करतूत आप नहीं देख सकते। अपने किसी ‘महान आंदोलन’ या ‘ऐतिहासिक प्रस्ताव’ की बेवकूफी समय के साथ समझ में आते ही वे उसे गायब कर देते हैं। प्रगतिशील लेखक संघ को ही लीजिए। अगर यह सतहत्तर वर्ष पहले कायम हुआ, तो तब से अब तक इसके सभी सम्मेलन-वक्तव्य, मूल्यांकन, आह्वान कहां हैं? उनसे फौरन पता चल जाएगा कि निराला के प्रति भी उनका रुख क्या था। वे दस्तावेज अब नहीं मिलेंगे। कम्युनिस्टों-प्रगतिशीलों में प्रचलित स्तालिनी तकनीक में पुरानी ‘भूलों’ को सशरीर नष्ट कर देने की परंपरा है। सत्ता में हों तो मनुष्यों को भी, अन्यथा किताबें, पैंफ्लेट आदि तो कहीं भी लुप्त हो जाते हैं। यह तो यहां गैर-कम्युनिस्ट शासन रहा कि राहुल, बच्चन, अश्क आदि जिंदा बच गए। अगर उक्त प्रगतिशील ‘संगठन मंत्री’ राजनीतिक सत्ताधारी बन सके होते तो उन सभी हिंदी हस्तियों का राम नाम सत्य होना भी संभव था। उनके आदर्श स्तालिन होने की यही तार्किक परिणति थी।
दरअसल, निराला का ‘मान-सम्मान’ तो बहाना है। मुख्य बात है हर उस लेखक, संपादक का अपमान करना जो वामपंथी मूर्खताओं पर लिखने-बोलने की कोशिश करे। इसीलिए किसी भी बात पर सहज विमर्श नहीं होने दिया जाता। सारी ताकत लेखक को बुरा-भला कहने पर लगाई जाती है। ताकि एक तो विषय बदले; दूसरे, सभी डरें कि ऐसा कुछ लिखा तो कीचड़ उछाली जाएगी। निराला के बारे में 14 जुलाई के मेरे लेख की बातों पर रहने के बजाय लेखक के किसी ‘एजेंडे’ पर बार-बार जोर देना वही चीज है। यह अकारण भी नहीं।
सोल्झेनित्सिन ने लिखा है कि लोग मशीनगनों के सामने भी उतना कायरतापूर्ण व्यवहार नहीं करते, जितना वामपंथी लफ्फाजों के सामने। वामपंथियों की गाली-गलौज और कुत्सापूर्ण अभियान चलाने की आदत से अच्छे-अच्छे लोग डरते हैं। जैसे मुहल्ले में भले लोग किसी छींटाकशी करने वाले शोहदे से बच कर निकलना चाहते हैं। उसी तरह, अनेक जानकार भी वामपंथियों की निशानेबाजी से बचने के लिए उन्हें तरह देते हैं। अनुचित सम्मान और स्थान देते हैं, ताकि वे तुष्ट रहें। अपनी यह नकारात्मक ताकत वामपंथी भी जानते हैं।

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निराला का ‘हिंदू सांप्रदायिक’ होना

वीरेंद्र यादव
जनसत्ता 21 जुलाई, 2013: ‘क्या निराला प्रगतिवादी थे?’ शीर्षक लेख (14 जुलाई) में शंकर शरण ने ‘जाकी रही भावना जैसी’ की तर्ज पर निराला की मनमानी मूरत गढ़ने के बाद अपने एजेंडे के तहत उसे ढहाने का करतब किया है। निराला को न कभी ‘वामपंथी अर्थ वाला प्रगतिशील’ कहा गया और न ही मार्क्सवादी। खुद रामविलास शर्मा ने उनका मूल्यांकन करते हुए लिखा है, ‘‘वह विचार क्षेत्र में मार्क्सवाद को पूरी तरह न स्वीकार करके भी व्यवहार में हिंदी के हर मार्क्सवादी लेखक से आगे थे।’’ लेकिन उन्हें प्रगतिशील जुमले वाला ‘हिंदू सांप्रदायिक’ सिद्ध करना उनकी छवि को धूमिल करना है। दरअसल, इन दिनों जिस तरह कुछ लोगों के निशाने पर प्रगतिशीलता और वाम विचारधारा है उसमें किसी का भी मान-मर्दन कोई नई बात नहीं है… निराला के साहित्य और वैचारिक सोच को लेकर बहस हमेशा से होती रही है। उनके वेदांत और सनातन हिंदू रुझान की भी जब-तब चर्चा होती रही है, लेकिन यह कहना कि ‘निराला प्रगतिवादियों को पसंद भी नहीं करते थे। उन्हें वे अज्ञानी, अहंकारी और पर-उपदेश कुशल लगते थे’ तथ्यों से परे, असत्य और आपत्तिजनक है। विशेषकर तब जब इसके पक्ष में एक भी तथ्य या प्रमाण न दिया गया हो।
सच तो यह है कि निराला का प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन से ही नहीं, बल्कि वामपंथी राजनीति से भी मैत्रीपूर्ण रिश्ता था। 1945 में कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘लोकयुद्ध’ के दो वर्ष पूरे होने पर प्रकाशित विशेषांक में उन्होंने अपना यह संदेश भेजा था, ‘‘तुम्हारी पार्टी के लिए मेरे हृदय में अपार श्रद्धा है’’ इसी के साथ उन्होंने ‘जल्द जल्द पैर बढ़ाओ’ शीर्षक वह कविता भी भेजी थी, जिसकी ये पंक्तियां आज हर किसी की स्मृति में हैं: ‘‘आज अमीरों की हवेली होगी किसानों की पाठशाला/ धोबी, पासी, चमार, तेली खोलेंगे अंधेरे का ताला।’’ (लोकयुद्ध, अंक 47, 3 जून 1945, पृष्ठ 4)। प्रगतिशील आंदोलन की पत्रिका ‘हंस’ ने जून 1948 में अपना ‘दमन विरोधी’ अंक निकाला, जिसके मुखपृष्ठ पर साफा बांधे हुए निराला का चित्र और उनके कविता की ये पंक्तियां छपी हैं: ‘‘खुला भेद/ विजयी कहाए हुए जो/ लहू दूसरों का/ पिए जा रहे हैं’’।
इतना ही नहीं, निराला ने अपनी कहानी ‘जानकी’ में स्वयं को कम्युनिस्ट नेता कल्पित करते हुए लिखा है: ‘‘नौजवानों के साथ रहने के कारण, एक कदम आगे बढ़ गया हूं, यानी कम्युनिस्ट हूं। कांग्रेस सोशलिस्ट के नाम से हमें झेंप आती है।’’ यह कहानी उनके कलकत्ता प्रवास के उन दिनों के अनुभवों पर आधारित है, जब उनकी मुलाकात कम्युनिस्ट नेता मुजफ्फर अहमद से होती रहती थी। एक अन्य अवसर पर कांग्रेस की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा: ‘‘हाई कमांड लिए फिरते हैं। प्रापर्टी का मामला आने दो, देखें तब कितना देते हैं। बैंकिंग की व्यवस्था बहुत खराब है। यह खत्म होनी चाहिए। जमींदारी भी। और हम चाहते क्या हैं? रुपया बांट कर लोग सुख से रहें, सच्चे मेल से रहें। कम्युनिज्म और क्या है?’’ (निराला की साहित्य साधना 1, पृष्ठ 364)
निराला की इन्हीं अभिव्यक्तियों का परिणाम था कि जब वे बीमारी और धनाभाव के दौर से गुजर रहे थे, तब शुभचिंतकों द्वारा सरकारी सहायता जुटाने के प्रयास को संयुक्त प्रांत के अर्थमंत्री कृष्णदत्त पालीवाल ने यह कह कर अस्वीकार कर दिया था कि ‘‘सरकार उनकी मदद करेगी तो लोग कहेंगे, कम्युनिस्ट की मदद की।’’ इस पर क्रुद्ध होकर पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ ने पालीवालजी को पत्र में लिखा था, ‘‘… निराला हुआ करें कम्युनिस्ट; ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ के लेखक श्यामलाल पार्षद के लिए ही सरकार ने क्या किया?’’ (हंस, जून 1948) ये सारे तथ्य तब के हैं, जब न अकादमियां बनी थीं और न उन परवामपंथियों का कब्जा था। उन्हीं दिनों अमृतलाल नागर ने वाम विचारधारा से प्रेरित होकर ‘कास्मिक सोशलिस्ट’ नामक संस्था बनाई थी और इस संस्था के तत्त्वावधान में निराला का अभिनंदन भी किया था। राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक ‘नए भारत के नेता’ में पीसी जोशी, हाजरा बेगम, जेडए अहमद, सज्जाद जहीर सरीखे कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों के साथ निराला को भी शामिल किया है।
हरिवंश राय बच्चन निराला के समकालीन थे। वे स्वयं न प्रगतिवादी थे न मार्क्सवादी। लेकिन उन्होंने लिखा है कि ‘‘निराला के व्यक्तित्व का एक पक्ष तो उस समय से प्रगतिवादी था, जब प्रगतिवादियों का जन्म भी नहीं हुआ था।’’ बच्चन ने निराला को ‘सर्वहारा कलम का मजदूर’ करार देते हुए लिखा है कि ‘‘कुकुरमुत्ता’ कविता में ‘सर्वहारा के प्रतीक निराला थे। कुकुरमुत्ते की आवाज में निराला बोले थे; निराला का प्रतीक कुकुरमुत्ता था, निराला ही कुकुरमुत्ता थे।’’ बच्चनजी ने यह भी लिखा कि ‘‘कुकुरमुत्ता’ प्रगतिवाद की सबसे बड़ी उपलब्धि है और अब तक हिंदी का सबसे प्रखर व्यंग्य काव्य है… उत्तर भारत में निराला प्रगतिवादियों के नेता बना लिए गए… निराला का दृष्टिकोण प्रगतिवादी था- जमींदार, साहूकार, उच्च वर्ग, अधिकारी वर्ग, स्वार्थसाधक, राजनीतिक दल के बीच निराला की हार्दिक सहानुभूति त्राषित-शोषित किसान के साथ स्पष्ट थी।’’
निराला ने ‘किसान और उसका साहित्य’ शीर्षक लेख में यह तक लिखा है कि ‘‘जब तक किसानों और मजदूरों का उत्थान न होगा, तब तक सुख और शांति का केवल स्वप्न देखना है… यहां उन पक्के सिद्धांत वालों का काम है, जो सत्य ही अपने गरीब भाइयों को प्यार करते हैं, उन समझदारों की आवश्यकता है, जो जाति, वर्ण के अज्ञान को शिक्षा की अग्नि से जला कर शुद्ध और समदर्शी हो गए हैं।’’ क्या यह समझना कठिन है कि निराला जाति-वर्ण से मुक्त किन पक्के सिद्धांतवादियों की ओर संकेत कर रहे थे?
इन सारे तथ्यों के बावजूद यह हठ न किसी का है और न होना चाहिए कि निराला वामपंथी या मार्क्सवादी थे। लेकिन उन्हें ‘सचेत हिंदू’ या प्रगतिशील शब्दावली के ‘हिंदू सांप्रदायिक’ कहना अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे में निराला को कैद करना है। सच तो यह है कि निराला जैसे भी हिंदू रहे हों, वे हिंदू धर्मवादियों के किसी काम के न थे, क्योंकि वे शास्त्र, ब्राह्मण और वर्णाश्रम धर्म के कठोर आलोचक थे। उनका कहना था कि ‘‘तोड़ कर फेंक दीजिए जनेऊ जिसकी आज कोई उपयोगिता नहीं, जो बड़प्पन का भ्रम पैदा करता है, और समस्वर से कहिए कि आप उतनी ही मर्यादा रखते हैं ,जितनी आपका नीच-से-नीच पड़ोसी, चमार या भंगी रखता है।’’
हिंदू धर्म में स्त्रियों की दुर्दशा पर उन्होंने लिखा था कि ‘‘आंखों के अंधे पंडितों द्वारा बनाए हुए मनमाने शास्त्रों की दुहाई दे देकर नृशंस हिंदू-समाज नारी-हृदय की भभकती हुई विरोधाग्नि को बुझाना चाहता है… यदि कहीं उसने पुनर्विवाह करने की इच्छा की, तो सारे हिंदू शास्त्रों और ब्राह्मणों, बिरादरियों तथा संबंधियों की संगठित शक्ति उस मृतप्राय नारी की नन्ही सी जान की गाहक हो उठती है… उस मृतप्राय और असहाय अवस्था में भी हिंदू शास्त्र उस पर कायरतापूर्ण हमला करता है, हिंदू समाज उसका रक्त चूसना चाहता है।’’ उनका स्पष्ट कहना था कि ‘‘आज ब्राह्मण-विचार, पुरानी परिपाटी जितने अंशों में यहां है, देश उतने ही अंशों में पराधीन है, और नवीन मानव धर्म जितने अंशों में, उतने ही अंशों में देश स्वतंत्रता प्रेमी।’’ (सुधा, जन. 31)
यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे निराला को वाम-विरोधी एजेंडे के तहत सांप्रदायिक हिंदू छवि में ढाला जा रहा है। वाम का विरोध करने से किसी को कौन रोक सकता है? लेकिन इसके लिए क्या यह भी जरूरी है कि निराला सरीखे अपने ही शीर्ष साहित्यिक-सांस्कृतिक व्यक्तित्व का मान-मर्दन किया जाए?

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