Democracy in ancient Indian


प्राचीन भारत में गणराज्य

जनसत्ता 23 जून, 2013: अंग्रेजी शासन के अधिकारी और अंग्रेज लेखक ऐसे मंतव्य प्रकाशित करते रहते थे कि भारत में सदैव निरंकुश राजाओं का ही शासन रहा है, भारतवासी प्राचीनकाल से ही निरंकुशता के अभ्यस्त रहे हैं, इस्लामी शासकों की निरंकुशता तो सर्वविदित है- इसलिए भारत पर अंग्रेजों जैसा शासन अनुचित नहीं है।

इस चर्चा से इतिहास में प्रचलित राज्य-व्यवस्थाओं के चरित्र पर बातचीत शुरू हो गई। लॉर्ड कर्जन द्वारा 1904 में बंग भंग किए जाने पर यह चर्चा और तेज होने लगी। प्राचीन भारत की राज्यव्यवस्था का प्रश्न राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़ गया।
काशीप्रसाद जायसवाल ने इस विषय पर सर्वप्रथम सबसे प्रामाणिक विचार प्रस्तुत किए। जायसवाल ने 1911-13 में ‘कलकटा वीकली नोट्स’ और ‘मॉडर्न रिव्यू’ में अंग्रेजी में लेख लिखे और 1912 के हिंदी साहित्य सम्मेलन में एक निबंध हिंदी में पढ़ा। इन लेखों के आधार पर 1918 में अंग्रेजी में एक ग्रंथ बना, जो कुछ विलंब से 1924 के अंत में कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुआ। इसे तुरंत वहां इतिहास के पाठ्यक्रम में स्थान मिला। शीघ्र ही देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी इसे पढ़ाया जाने लगा। प्राचीन भारत की राज्य-व्यवस्था पर लिखा गया यह पहला और महत्त्वपूर्ण ग्रंथ था। इसका रामचंद्र वर्मा ने हिंदी अनुवाद किया। इसी ग्रंथ का पुनर्मुद्रण अब हुआ है।
काशीप्रसाद जायसवाल अनुपम इतिहासकार थे। उन्होंने प्राचीन भारत के उन्हीं पहलुओं पर शोधकार्य किया, जिनको अन्य किसी ने नहीं छुआ था। हिंदू राज्य-तंत्र के अलावा उन्होंने 180 से 320 ई. तक के इतिहास पर भी लिखा। तब तक इस काल के इतिहास के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी। इसीलिए इसे ‘अंधकार युग’ कहते थे। जायसवाल ने खुदाइयों में प्राप्त सामग्री, मूर्तियों, मुद्राओं और पुराणों में मिलने वाले विवरणों के आधार पर नाग-भारशिव, वाकाटक और सातवाहन साम्राज्यों का यह विवरण पहली बार 1932 में प्रकाशित किया।
प्राचीन मुद्राओं के विषय में उनकी विशेषज्ञता का सभी इतिहासकार लोहा मानते थे। मौर्य और गुप्तकाल की मुद्राओं पर उनके कार्य पर लंदन की रायल एशियाटिक सोसाइटी ने उन्हें 1931 में व्याख्यान देने के लिए बुलाया। वे ‘न्युमिस्मैटिक सोसाइटी आॅफ इंडिया’ के 1934 और 1936 में दो बार अध्यक्ष चुने गए। प्राचीन लिपियों को पढ़ने में उन्हें दक्षता प्राप्त थी, वे खारवेल (173-160 ई.पूर्व) के हाथीगुंफा लेख को बांचने में सफल रहे। उनकी प्रेरणा से नालंदा आदि लुप्तप्राय स्थानों की पुरातात्त्विक खुदाई हुई। पटना संग्रहालय के स्थापना काल से वे घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे और उसके संग्रह को बनाने और बढ़ाने में उनका विशेष योगदान था।
उनकी जीविका का साधन वकालत थी। लेकिन उनका शेष समय इतिहास-शोध में ही लगता था। उनसे इतिहास के विद्यार्थी प्रोत्साहन पाते ही थे, हिंदी के साहित्यकारों, पत्रकारों को भी उनसे प्रभूत प्रेरणा और सहायता मिलती थी। महापंडित राहुल सांकृत्यायन को उन्होंने ही तिब्बत की यात्रा पर भेज कर वहां से असंख्य पांडुलिपियां मंगवार्इं, जिन पर आज तक शोध और अनुवाद कार्य चल रहा है। इस महत्त्वपूर्ण सामग्री को सुरक्षित रखने के लिए काशीप्रसाद जायसवाल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई।
‘हिंदू राज्य तंत्र’ के दोनों खंडों में कुल मिला कर उनतालीस अध्याय हैं। इनके लिखने में वेदों, पुराणों, महाभारत, धर्मशास्त्र ग्रंथों, पाणिनि के व्याकरण, कौटिल्य के अर्थशास्त्र (इसकी पांडुलिपि जायसवाल द्वारा इस विषय पर हाथ लगाने के कुछ ही वर्ष पहले 1905 में मिली थी), काव्य-नाटक आदि संस्कृत के साहित्य ग्रंथों, मेगस्थनीज और एरियन जैसे यूनानी वृत्तांतों और इतिहास के अन्य सभी स्रोतों का पूरा उपयोग किया गया है।

इसके दो खंडों में 1000 ई. पूर्व से लेकर 1000 ई. तक भारतीय इतिहास के दो हजार वर्षों में विकसित राजनीतिक संस्थाओं की विवेचना की गई है।

इस ग्रंथ में पहले वैदिककाल की ‘समिति’ और ‘सभा’ संस्थाओं का विवरण है। वैदिककाल तक भारतीय समाज काफी विकसित हो चुका था। इन संस्थाओं में समाज के चुने गए प्रतिनिधि भाग लेते थे। काशीप्रसाद जायसवाल ने ‘समिति’ और ‘सभा’ के संघटन, इनके राजनीतिक कार्यों, निर्णय के पहले इनमें चलने वाले वाद-विवादों और समाज में न्याय स्थापित करने में इनकी भूमिका का प्रमाणों के साथ विवेचन किया है।
वैदिककाल के बाद गणों और संघों का युग आता है। उस समय पश्चिमी और भारतीय विद्वानों में इन श‘गण’ शब्द की परीक्षा करते हुए पाणिनि के मत की पुष्टि की, जिन्होंने ‘संघ’ और ‘गण’ को समानार्थक और देश के अनेक भागों में प्रचलित राजनीतिक संस्था बताया था। उस समय तक धार्मिक ‘संघ’ नहीं बने थे। पाणिनि से यह भी पता चलता है कि उस समय इन गणों में ब्राह्मणों और क्षत्रियों के अलावा अन्य जातियां भी भाग लेती थीं। ‘गण’ के अनेक सदस्यों के वर्ण अभी तक निर्धारित नहीं हुए थे।
यूनानी लेखकों ने पंजाब और सिंध में ‘जाथरोई’ लोगों के होने का उल्लेख किया है। ‘अर्थशास्त्र’ ने इन्हें एक संघ कहा है। संभवत: यह क्षत्रिय लोगों का संघ था, जिन्हें बाद में खत्री कहा जाने लगा। ये लोग सिंध और पंजाब में 1947 तक बसे हुए थे। यूनानी लेखकों द्वारा प्रयुक्त अन्य शब्दों का विश्लेषण करते हुए जायसवाल ने अरिष्ट, सौभूति, आदि गणों का उल्लेख पाया है। सिकंदर को लौटते हुए सिंधु नदी से ब्लूचिस्तान प्रजातांत्रिक राज्य मिले थे, जिनमें मालव, अंबष्ठ और क्षुद्रक गणों के लोग भी थे।
जायसवाल ने यूनानी ग्रंथों के आधार पर इन गणों में चलने वाली शासन-व्यवस्था का विवरण दिया है। उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और जैन आचारांगसूत्र आदि के आधार पर अराजक राज्य, गण द्वारा शासित राज्य, युवराज द्वारा शासित राज्य, द्वैराज्य, वैराज्य और दरों द्वारा शासित राज्य आदि राज्य-व्यवस्थाओं की कल्पना की है। उन्होंने इन प्रजातंत्रों की कार्यप्रणाली, इनकी नागरिकता, इनकी न्याय-व्यवस्था और कानून और ‘महाभारत’ के ‘शांति पर्व’ के अनुसार इन प्रजातंत्रों की मुख्य बातों के साथ ही नए प्रजातंत्रों के सृजन का विवरण दिया है।
मौर्य साम्राज्य की स्थापना के बाद भी मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत बहुत-से राज्य ऐसे थे, जो अपना शासन स्वयं चलाने के लिए स्वतंत्र थे। यौधेय, मालव, राजन्य आदि गण तो शुंग काल और क्षत्रप काल के बाद भी बचे हुए थे। सिकंदर का सफल मुकाबला न कर पाने के कारण गण शासन प्रणाली की आलोचना होने लगी थी। कौटिल्य से यह भी जानकारी मिलती है कि इनके अधिकारियों की व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता और शक्ति की तृष्णा के कारण इनमें ईर्ष्या और द्वेष के बीज बोए जा सकते हैं। अनेक कारणों से गण राज्यों का ह्रास और नाश हुआ होगा।
ग्रंथ के दूसरे खंड में जायसवाल ने एकराजतंत्र की विवेचना की है। ऐतरेय ब्राह्मण और बाद के ग्रंथों में दी गई राज्याभिषेक की व्यवस्थाओं के आधार पर उन्होंने कुछ सिद्धांत निकाले हैं। प्रारंभ में ये राज्य जनपद और पौर राज्य थे। इनका शासन बहुत विचारसम्मत होता था। इनके संगठन में मंत्रिपरिषद का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान होता था। इससे लगता है कि राजा निरंकुश नहीं हो सकते थे। अशोक के शिलालेखों से पता चलता है कि मंत्रिपरिषद अशोक के आदेशों का विरोध और अवज्ञा कर सकती थी।
जायसवाल के शब्दों में: ‘‘हिंदुओं का एकराज-राज्य वास्तव में एक नागरिक राज्य था।… हिंदू राज्य कभी सैनिक राज्य नहीं होता था।… प्रधान सेनाध्यक्ष और सेना के दूसरे बड़े-बड़े अधिकारी राष्ट्र-परिषद द्वारा नियुक्त किए जाते थे।… सेनाएं किसी राजा को राज्यच्युत नहीं कर सकती थीं, कभी-कभी जनता ने ही उन्हें राज्यच्युत किया है।… वैदिक काल से ही सेना का पद राजा के पद से बिल्कुल भिन्न हुआ करता था। इसी प्रकार हमारे यहां यह भी सिद्धांत था कि जहां तक हो सके युद्ध न किया जाए और विशेषकर केवल दूसरों पर विजय प्राप्त करने के लिए युद्ध करना तो और अनुचित समझा जाता था।…

राज्यतंत्र में धर्म या कानून का स्थान सबसे बढ़ कर और उच्च था।… एरियन ने ‘इंडिका’ में लिखा है कि ‘वे (हिंदू) कहते हैं कि न्यायशीलता किसी हिंदू राजा के भारत के सीमाओं से बाहर जाकर विजय प्राप्त करने से रोकती है।’’… मौर्य सम्राटों के पड़ोसी सेल्यूकस का साम्राज्य बहुत ही दुर्बल और छिन्न-भिन्न हो रहा था।… उन्होंने उसे कभी जीतने का विचार भी नहीं किया।… हिंदू राज्यों की आयु असाधारण रूप से दीर्घ हुआ करती थी और राजा और प्रजा में कभी कोई भीषण संघर्ष नहीं होता था और हम समझते हैं कि समाजशास्त्र के ज्ञाता इतिहासज्ञ लोग इन बातों का मुख्य कारण यही मानेंगे कि हिंदू राज्यतंत्र का स्वरूप नागरिक और धर्मयुक्त था।’’
जायसवाल के इस मौलिक शोधग्रंथ का महत्त्व अब भी बरकरार है। इसके फिर से प्रकाशन से निस्संदेह इतिहास के शोधार्थियों को लाभ मिलेगा।

कमलेश
हिंदू राज्य-तंत्र: काशीप्रसाद जायसवाल; अनुवादक: रामचंद्र वर्मा; विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी; 400 रुपए।

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