Hindu Help Line announces Medical & Legal Aid Schemes for the Poor

http://hindunewsnetwork.wordpress.com/2012/11/25/hindu-help-line-announces-medical-legal-aid-schemes-for-the-poor-all-over-the-nation/download

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Seva work by ABVP at Puri Ratha Jatra 2012

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seva work by ABVP


Akhil bharatiya vidyarthi parishad tarafaru mahaprabhu jagatara natha shri shri jagannath kara pabitra ratha yatra-2012 abasara re eaka  seva karyakrama karajaithila eathire odisha paradesh ru 11ta sthan ru 50 jana karyakarta upashthit  thile ABVP, puri nagar sanjojana re ayaojita eahi seva karya re bibidha prakara ra seva karya karajaithila gundicha mandira pachapata matiapada chhaka re ashuchikcha kendra kara jai maganare rogimana ku ashuchikcha karajai oushdha bitarana madhya karajai thila, balagandi chhaka thare eaka paniya jala bantana kendra khola jai pani pauch bantana kara jaithila.  sehipari badadanda ra eaka paramukha sthana town thana chhaka re madhya sardhalu manaku pani pauch bantan kara jaithila. 2ti jala shinchana jantra sahajyare ratha pakhare jala sinchana karajaithila. eahi karayakarma ku rajya saha samapadak krushna chandra padhi, puri bibhag paramukh mahesh mishra, saha pramukh ajay rout, purbatana rajya savapati siba prashad padhi, omkar parida, rajesh kumar debata parmukha eahi seva karya ku chalaei bare shayog kari thile.



                                                                        krushna chandra padhi

Only Sangha Can Do It

संघ की रीत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के, उसकी कार्यव्यवस्था के लिए संपूर्ण भारत में ३९ प्रान्त है. उनमें का एक प्रान्तहै मालवा. यह अलग प्रान्त हाल ही में, मतलब एक वर्ष पूर्व बनाया गया. जिसे शासकीय मध्य प्रदेशराज्य संबोधित किया जाता है, उसके संघ की दृष्टि से तीन प्रान्त है- महाकौशल, मध्य भारत औरमालवा. एक वर्ष पूर्व तक, ‘मालवा’ का अंतर्भाव मध्य भारत में ही होता था.
इस मालवा प्रान्त का, प्रथम वर्ष प्रशिक्षण का संघ शिक्षा वर्ग इस वर्ष शाजापुर में संपन्न हुआ. उसमेंमालवा प्रान्त के संघ दृष्टि से २६ जिलों (सरकारी दृष्टि से १५ जिलों) में से ५०२ शिक्षार्थी शामिल हुए.उनमें २७८ विद्यार्थी, ८० किसान और १४४ व्यवसायी थे. इनके अलावा, ५३ शिक्षक और व्यवस्था के लिए७० स्वयंसेवक. आप कहेंगे कि यह सब ब्यौरा देने का कारण क्या? हर प्रान्त में प्रति वर्ष २० दिनों केऐसे वर्ग होते है. मालवा की विशेषता क्या है? विशेषता यह है कि, करीब सव्वा छ: सौ लोगों के लिए जोभोजन बनाया जाता था, उसमें रोटियॉं नहीं बनाई जाती थी. तो, दक्षिण में के संघ शिक्षा वर्गों की तरहमालवा में भी शिक्षार्थीयों को भोजन में केवल चावल ही खाना पड़ता था? नहीं. शाजापुर के परिवार रोज,इन सव्वा छ: सौ स्वयंसेवकों के लिए रोटियों की व्यवस्था करते थें. इस व्यवस्था में ११०० परिवार शामिलथें और वे रोज ११ हजार रोटियॉं इन स्वयंसेवकों के लिए तैयार रखते थें. एक दिन नहीं. पूरे बीस दिन.सामाजिक अभिसरण की यह संघ की रीत है. नागपुर के पुराने स्वयंसेवकों को याद होगा कि, वर्ष १९६२में, जब रेशीमबाग के स्मृतिमंदिर का उद्घाटन समारोह हुआ, तब बाहर गॉंव से आएं करीब दो हजारकार्यकर्ताओं की व्यवस्था नागपुर के स्वयंसेवकों के घर की गई थी. लेकिन वह केवल एक-दो दिनों की बातथी. शाजापुर का समाजनिबंधन २० दिनों का था.

The teacher is the real hero to change Kakoda Village, Maharashtra

एक शिक्षक ने बदला काकोडा गॉंव का रूप 

newsbharati.com से साभार

$img_titleमहाराष्ट्र राज्य के जलगॉंव जिले के मुक्ताईनगर तहसील में बसा काकोडा गॉंव भारत के अधिकांश गॉंवों के समान अनेक समस्याओं से जूझ रहा था. १९७७ में, गॉंव में के एक शिक्षक भालचन्द्र दिनकर कुलकर्णी ने गॉंव सुधार के उपाय आरंभ किए. लोगों ने उन उपायों को सक्रिय प्रतिसाद दिया और आज यह गॉंव एक उपक्रमशील गॉंव का नमूना बन गया है.
गॉंव में अधिकांश किसान और खेतीहर मजदूर रहते है. खेती बारिश पर निर्भर होने के कारण गॉंव के अधिकांश लोग वर्ष में करीब छ: माह बिना रोजगार के बेकार रहते थे. लोगों के आपस में तंटे-बखेड़े चलते रहते थे. गॉंव में गंदगी फैली थी.  साल भर पानी भी नहीं मिलता था. धूपकाले में दूर-दूर से पानी लाना पड़ता था. रस्ते नाममात्र को ही थे. सारे गॉंव में दो-चार घरों में ही बिजली थी. जैसे-तैसी बदहाली में गॉंव का जीवन चल रहा था. $img_title
इसी गॉंव में भालचन्द्र कुलकर्णी नाम के एक शिक्षक रहते है. १९७७ में वे ग्राम विकास मंडल के अध्यक्ष थे. तब उन्होंने गॉंव की यह स्थिति बदलने की ठानी. इसके लिए उन्होंने गॉंव की भावी पी़ढ़ि – विद्यार्थीयों – को माध्यम बनाना तय किया. मंडल की ओर से गॉंव के विद्यार्थीयों के लिए अभ्यासिका शुरू की. पहले वर्ष केवल पॉंच विद्यार्थी इस अभ्यासिका में आते थे. आज इस अभ्यासिका में आने वाले विद्यार्थीयों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि इसकी व्यवस्था के लिए चार कार्यकर्ता काम करते रहते है. पहली से बारवी कक्षा तक के, आर्थिक दृष्टि से पिछड़े विद्यार्थीयों के लिए पुस्तके उपलब्ध कराई जाती है. छोटे बच्चों में पढ़ने की रुचि जागृत करने के लिए बाल ग्रंथालय शुरू किया गया है.
गॉंववालों को सफाई का महत्त्व ध्यान में लाने के लिए, ग्रामसफाई के लिए कार्यकर्ताओं की टोली बनाई गई. और इन कार्यकर्ताओं ने सर्वप्रथम खुद ग्रामसफाई का काम हाथ में लिया, गॉंव में पड़ा कचरा इकट्ठा किया, रस्ते साफ किए और अपने आचरण से लोगों को सफाई का महत्त्व बताया. गॉंव के लोग भी साथ जुड़ते गए और ग्राम सफाई अभियान सफल हुआ. गंदे पानी की निकासी के लिए नालियॉं बनाई गई. घरघर में संडास बनाये गये. इससे गॉंव साफ रखने में बहुत सहायता मिली.
काकोडा गॉंव छोटा होने के कारण यहॉं प्राथमिक स्तर की $img_titleभी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध होने का प्रश्‍न ही नही था. इसके लिए मंडल की ओर से ‘आरोग्य पेटी’ (हेल्थ किट) योजना प्रारंभ की गयी.
समाज के हर स्तर पर कार्य करने का मंडल का प्रयास है. इस क्षेत्र के खानाबदोश समाज के लिए गॉंव में एक छोटी बस्ती बसाई गई. उन्हें मकान दिए गए. पानी के लिए बोअरवेल खोद दी. ये खानाबदोश अधिकतर आर्थिक दृष्टि से पिछड़े होते है. आर्थिक अभाव में वे अपने बच्चों की शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर पाते. इस कारण, बच्चों की शिक्षा की ओर इच्छा होते हुए भी वे ध्यान नहीं दे सकते. यह देखते हुए इन बच्चों की शिक्षा और निवास की व्यवस्था मंडल के आश्रमशाला में की गई और उनके लिए शिक्षा के द्वार खुले.
गॉंव का विकास सब के सहायता से होना चाहिए ऐसी इस संस्था की धारणा है. इस दृष्टी से सब लोगों को इकठ्ठा लाने के लिए हर साल दुर्गा उत्सव बडे पैमाने पे आयोजित किया जाता है. हर साल सामूहिक वृक्षारोपण किया जाता है. इसी के साथ भूजल का स्तर बढाने के लिए योजनाए बनायी है और गाववालों के सहायता से वे सब यशस्वी भी हुयी है. भू-जल संग्रहण के लिए योग्य स्थानों पर जल-पुनर्भरण उपक्रम लिए गए. इसका परिणाम भी मिला. अब ग्रीष्म में भी गॉंव में पानी उपलब्ध रहता है.$img_title
स्थानीय स्तर पर सिंचाई की व्यवस्था के अंतर्गत जगह-जगह ‘खेत तालाब’ बनाए गए और नदी पर छोटा बांध बांधकर पानी रोका गया. इससे काफी क्षेत्र को सिंचाई का लाभ मिला. किसानों को खेती के बारे में नवीनतम जानकारी उपलब्ध कराने के लिए प्रतिवर्ष किसान मेला आयोजित किया जाता है.
महिलाओं को आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी बनाने के लिए, महिलाओं का बचत समूह स्थापन किया. इस समूह की सदस्य घर के कामकाज करने के बाद इकठ्ठा आकर पापड बनाती है. यह पापड आसपास के बाजार में बेचे जाते है. रोजगार निर्मिति के अंतर्गत युवकों को भेड़-पालन, कटिंग सलून, किराना दुकान तथा अन्य छोटे उद्योगों के लिए ॠण दिलाए गए; अनेक युवकों को रोजगार मिला.इन उपक्रमों के साथ ही समाज-जागृति और व्यसन-मुक्ति उपक्रम भी चलाए जाते है. इसके लिए गॉंव के लोगों की ही एक ‘भागवत समिति’ बनाई है. इस समिति द्वारा भजन-कीर्तन के माध्यम से समाज- जागृति और व्यसन-मुक्ति का प्रचार किया जाता है. गाव का वातावरण मंगलमय हो इस लिए हनुमानजी का मंदिर स्थापित किया है. भालचंद्र कुलकर्णी के ग्रामविकास मंडल के कारण अब यह काकोडा गॉंव पूर्णत: खुशहाल और प्रगतिशील बना है, इसमें कोई दोराय नही.

संपर्क
श्री भालचन्द्र कुलकणीं
काकोडा, तहसील : मुक्ताईनगर
जिला : जलगॉंव
दूरभाष : ०२५८३-२८३०६९
मोबाईल : ०९४२०९ ३८६४९

कैसे पहुँचे
महाराष्ट्र के खान्देश क्षेत्र के जलगॉंव जिले के मुक्ताईनगर तहसील में यह काकोडा गाव बसा है. काकोडा गॉंव मुक्ताईनगर से ३५ कि. मी. दूर है और जलगावँ से मुक्ताईनगर ३५ कि. मी. दूरीपर है.
हवाई मार्ग : जलगॉंव में हवाई पट्टी है लेकिन हवाई जहाज से मुंबई आकर फिर जलगॉंव आना सुविधाजनक रहेगा. मुंबई से जलगॉंव ४१६ कि. मी. दूरीपर है.
रेल मार्ग : मध्य रेल के मुंबई-हावडा रेललाईन पर जलगाव महत्त्वपूर्ण स्टेशन है.
सडक मार्ग : जलगॉंव आने के लिए गुजराथ, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के सर्व प्रमुख शहरों से बससेवा उपलब्ध है. जलगॉंव आने के बाद बस द्वारा काकोडा गॉंव पहुँच सकते है.

HEALTH CAMP FOR NEEDY PEOPLE BY SUSHRUTA SWASTHYASEVA PRAKALPA,BURLA

A health  & sickle cell blood screening camp was organised by SUSHRUTA SWASTHYASEVA ImagePRAKALPA,BURLA at PARDHIAPALI on dt. 22.5.2012. It became successfull due to kind help and support provided by doctors and sickle cell unit of VSS MEDICAL COLLEGE .A huge no of patients nearly 250 of them got their health checked up and screened up their blood.Many of them were childrens ,womens and old persons.We have never expected such success. The camp was started at 7am and concluded at 12pm.The name of the doctors as following are DR.JATINDRA MOHAN PUJARI ,DR SUDHANSHU BHOI,DR TAPAS DAS ,DR AJAY  DAS,DR SUDIPTA ROUT,DR ASUTOSH BISHOI,and from sickle cell unit SHRI ANTARYAMI BHOI AND CO.We are also thankfull to DR DILIP KUMAR PATEL for his constant support and guidance.Thankful to HRUSHIKESH NAG and swayamsevaks of pardhiapali  ashram.

mo- Tapash- 09438405636

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India’s first anti-malaria drug is among the ‘best’ – Jaya Bharat


 Three tablets in three days can cure the chill-n-kill disease 

The first indigenously made anti-malarial drug made its debut on Wednesday, arming doctors with one more weapon to fight the disease that kills thousands of Indians every year.

 Developed by Ranbaxy Laboratories with funding support from the department of science and technology, the novel drug completed clinical trials under the supervision of National Institute on Malaria Research — a constituent laboratory of Indian Council of Medical Research. After reviewing the data, the Drugs Controller General of India gave the marketing approval in 2011.

 Effective against malaria caused by Plasmodium falciparum parasite, its dosage regimen is one tablet a day for three days, costing Rs 130 a pack. It is not clear if the new drug will find a place in the public health programme.

 Preferred treatment 

The new drug is different from Artemisinin Combination Therapy (ACT), used worldwide as preferred treatment based on World Health Organisation recommendations.

 “It is the first anti-malarial drug developed in India which has entered the market unlike other molecules which did not,” said T S Balganesh, a distinguished scientist at the Council of Scientific and Industrial Research in charge of Open Source Drug Discovery programme, but not linked to Ranbaxy’s research work. 

“The new drug is a fixed dose consisting of arterolane maleate and piperaquine phosphate, in line with WHO recommendations. It is among the best options available today,” said Sudershan Arora, president (Research and Development) at Ranbaxy.

 “Malaria is highly endemic in 17 states and mostly affects the poor. The company should see the drug is affordable and accessible drug so that poor people can buy it,” Union Health Minister Ghulam Nabi Azad said during its launch. 

The ACT based drugs used in the national malaria control programme cost Rs 20 for an adult for a three-day regimen and half of that for children, an official from National Vector Borne Disease Control programme told Deccan Herald. 

Low death count 

Following questions being raised on India’s abysmally low official malaria death count, the centre set up an expert panel to review the figure. Preliminary estimates indicate that every year 35,000-40,000 adult Indians die of malaria, Azad said. 

According to an estimate by public health researchers from India and Canada, malaria killed 2,05,000 people every year in India, of whom1,20,000 are in the age group of 15-69 years and more than 80,000 children. 

A second study suggests that the number of annual malaria deaths in India was 1.57 lakh in 1980, which was reduced to 1.12 lakh in 2000 and 46,000 in 2010. 

Besides medicine, Azad said, manpower too was important in malaria control as most states had withdrawn malaria supervisor in block and village health centres.

http://www.deccanherald.com/content/244825/indias-first-anti-malaria-drug.html

 

Cow based Sustainable agricultural development by Janabharati

‘जनभारती’ द्वारा गोमाता केंद्रित खेती का आर्थिक सफल प्रयोग

स्रोत: News Bharati      तारीख: 4/18/2012 6:20:16 PM

$img_title‘प्रकृति का वरदहस्त प्राप्त महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में गन्ना और धान प्रमुख फसलें है. देश में हुई हरित क्रांति के लाभ बहुत प्रमाण में इस जिले के गॉंव-गॉंव तक पहुँचे है. नया तंत्रज्ञान, रासायनिक खाद और कीटनाशक तथा उन्नत बिजों का प्रयोग किसानों ने आरंभ किया. उत्पादन बढ़ने से किसान आनंदित हुए; लेकिन कुछ ही समय में इसका विपरित परिणाम देखने को मिला. भरपूर उत्पादन की आशा में आधुनिक पद्धति के नाम पर खेती में रासायनिक खाद का अंधाधुंद  प्रयोग होने लगा. रसायनों कीअति मात्रा के कारण खेती की उर्वरा शक्ति घटी. जैसे जैसे समय बीतता गया, उत्पादन और भी घटता गया; तब किसान जाग उठा और इस समस्या का हल ढूढने लगे.
$img_titleकिसान समस्याग्रस्त होने से गॉंव की व्यवस्था अस्तव्यस्त हो गई. उस समय, कोल्हापुर के ‘जनभारती न्यास’ ने उन्हें एक आसान उपाय- हर घर में कम से कम एक देसी गाय पालना- बताया.
१९९७-९८ को कोल्हापुर में प्रबोधन परिषद हुई थी. उसमें प्रमुख अतिथि के रूप में बोलते हुए विख्यात समाजसेवक नानाजी देशमुख ने कहा था कि जब तक खेती, किसान और गॉंव स्वावलंबी और समृद्ध नहीं बनेंगे, तब तक इस देश का भवितव्य उज्ज्वल नहीं हो सकता. इस आधार पर ही दिसंबर १९९९ में ‘जनभारती न्यास’ की स्थापना की गई थी.
नानाजी ने ऐसी भी सलाह दी कि, गाय के पंचगव्य से खेती जुड़ी है. गाय को केंद्रबिंदु मानकर पर्यावरण हितैषी खेती करें.
$img_titleफिर ‘जनभारती न्यास’ की सलाह से परंपरागत खेती के कालबाह्य चीजों को त्याग कर खेती आरंभ हुई. रासायनिक खाद के बदले सेंद्रीय खाद का प्रयोग शुरू हुआ. गोबर खाद से भूमि की उर्वरा शक्ति कायम रहती है. इसलिए रासायनिक खाद के कारण उर्वरा शक्ति खो चुकी खेती में गाय के गोबर का खाद डाला गया. अन्य भी उपाय किए गए.
फसल लेने के लिए खेत में का कूडाकचरा जलाया जाता था. फसलों में का खतवार बाहर फेंका जाता था. लेकिन अब किसानों ने अपना मन बदला. खेत में का जलाया जानेवाला, या फेंक दिया जाने वाला, फसलों के अवशेषों और पत्तियों को कचरा अब खेत में ही दबा दिया जाने लगा. इसके बहुत अच्छे परिणाम दिखने लगे. गाय के गोबर खाद से खेती की उर्वरकता बी बढ़ी. खेत में दबाया गया कचरा खेत की मिट्टी में मिलने के कारण मिट्टी का पोषण हुआ; उसकी जलधारण-क्षमता बढ़ी. गाय के गोबर और गोमूत्र से बने कीटनाशकों के प्रयोग से, फसलों पर रासायनिक कीटनाशकों के दुष्परिणाम टले.
$img_titleआगे चलकर किसानों ने गन्ने की बुआई में भी नई तकनीक अपनाई. गन्ने की पारियों पर उगी आँख (अंकुर) को क्यारी में लगाया जाता है. क्यारी में उनके पौधे तैयार होने पर उन्हें जड़ों सहित उखाडकर फिर खेत में बोया जाता है. पहले, इसके लिए आँख उगी पूरी पारी ही निकाल ली जाती थी. अब क्यारी में गन्ने की आँख लगाने के लिए, किसान पारी का आँख उगा हिस्सा ही काटकर निकालते है और गन्ने की हर पारी पर आँख फूटने के लिए, गन्ना बड़ा होने पर उसके छोर के पत्ते तोड देते है. इससे गन्ने की बचत होती है. गन्ने की फसल का पैसा हाथ आने के लिए करीब १४ माह का समय लगता है. इस दौरान गन्ने की फसल में अन्य दो-तीन फसलें (इंटरक्रॉप) ली जाती है. इससे किसान के पूँजी और नियमित खर्च की व्यवस्था हो जाती है.
$img_titleइस नये प्रयोग से किसानों का उत्पादन बढा और उत्पाद लागत काफी मात्रा में कम हुयी. इस कारण किसान प्रोत्साहित हुए. वे और अधिक और नये प्रयोग करने के लिए सामने आये. गन्ना और धान के खेती में खाली जगह पर अब वे फलों और सब्जियों का उत्पादन ले रहे है. इस कारण किसानों के हाथ में सालभर पैसा रहने लगा. रोजमर्रा की जरूरतों के लिए घरमें ही सब्जी इत्यादी फसल लेना उन्होने आरंभ किया. इससे बचत होने लगी. सही मायने में यहॉं का किसान चिंतामुक्त हो गया.
इस प्रयोगशीलता से ही कागल तहसील के वनमोर गॉंव के प्रगतिशील किसान- तानाजी निकम ने खुद के निरीक्षण और प्रयोग से खेती के व्यवस्थापन की एक नयी पद्धती खोज निकाली. उनके इस मेहनत को इतना यश मिला की, उनके द्वारा धान की फसल का दुनिया का सबसे ऊँचा पौधा उगाया गया और इसके ‘गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड’ में दर्ज किया गया. वे बताते है कि, सेंद्रिय खाद का उपयोग कर ही मैंने यह रिकार्ड हासिल किया है.
$img_titleइस प्रकार गाय को केंद्रबिंदु मानकर की गई सेंद्रिय खेती ने यहॉं के किसानों को केवल रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से छुटकारा ही नहीं दिलाया, उन्हें समृद्ध जीवन की राह भी दिखाई है. एक किसान ने तो गोमूत्र अर्क बनाने का भी उद्योग शुरू किया है. पंचगव्य से साबुन बनाने का प्रयोग भी सफल रहा है.
कई किसानों ने अब गोपालन के साथ कुक्कुट-पालन, भेड-पालन और मधुमख्खी-पालन सरीखे पूरक उद्योग भी शुरू किए है. महिलाओं ने बचत समूह स्थापन कर दुग्ध-व्यवसाय के साथ अन्य लघु उद्योग आरंभ किए है. अब यहॉं की महिलाएँ भी आर्थिक दृष्टीसे स्वावलंबी बन गयी है. जनभारती न्यास ने महिलाओं के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा है. उनके लिए नियमित रूप से स्वास्थ्य शिबिर आयोजित होते है. यहॉं की वीरान जगह पर करवंद (एक खट्टा फल) का जंगल दिखाई देता है. यहॉं की महिलाएँ अब इस करवंद का शरबत बनाकर बेचती है. इस स्वास्थ्यवर्धक शरबत के बिक्री से काफी लाभ मिल रहा है.
हर घर में एक देसी गाय पालने के आग्रह से, कुछ वर्ष पूर्व कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था की सफलता पर का विश्‍वास खो रहे देहातों में फिर इस अर्थव्यवस्था पर का विश्‍वास जाग उठा है. गोमाता ने खेती को नवसंजीवनी देते हुए रोजगारनिर्मिती भी कर दिखायी है. लोगों को निरामय बनाया है. गोमाता को कामधेनु के नाम से क्यों जाना जाता है, यह इस क्षेत्र के इस परिवर्तन से ध्यान में आता है.